लोकतंत्र में असहमति की आवाज चाहे बाहर से आए या भीतर से, वह व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करती है। लेकिन जब यह आवाज किसी ऐसे व्यक्तित्व की हो जो दशकों तक एक विचारधारा और एक राजनीतिक दल के सबसे मुखर समर्थकों में गिना जाता रहा हो, तो उसकी गूंज और भी गहरी हो जाती है।
हाल के दिनों में सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर ने भारतीय जनता पार्टी के आंतरिक तंत्र, उसके डिजिटल इकोसिस्टम और मुख्यधारा के मीडिया के साथ सत्ता की कथित ‘जुगलबंदी’ को लेकर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, वे किसी भी स्वस्थ
लोकतंत्र में असहमति की आवाज चाहे बाहर से आए या भीतर से, वह व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करती है। लेकिन जब यह आवाज किसी ऐसे व्यक्तित्व की हो जो दशकों तक एक विचारधारा और एक राजनीतिक दल के सबसे मुखर समर्थकों में गिना जाता रहा हो, तो उसकी गूंज और भी गहरी हो जाती है।
हाल के दिनों में सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर ने भारतीय जनता पार्टी के आंतरिक तंत्र, उसके डिजिटल इकोसिस्टम और मुख्यधारा के मीडिया के साथ सत्ता की कथित ‘जुगलबंदी’ को लेकर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, वे किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय होने चाहिए। विडंबना यह नहीं है कि आरोप लगाए गए, बल्कि विडंबना यह है कि इन आरोपों पर भाजपा और मुख्यधारा के मीडिया दोनों ने एक ‘रहस्यमयी सन्नाटा’ ओढ़ लिया है।
मधु किश्वर का यह दावा कि भाजपा का आईटी सेल अब वैचारिक प्रतिबद्धता के बजाय चाटुकारिता का केंद्र बन गया है और स्वतंत्र आवाजों को ‘ट्रॉल आर्मी’ के जरिए कुचला जा रहा है, सत्ता के भीतर पनप रहे एक खतरनाक अहंकार की ओर इशारा करता है। जब संगठन अपने ही पुराने साथियों की वाजिब आलोचना को सुनने के बजाय उन्हें दरकिनार करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि संवाद के रास्ते बंद हो चुके हैं। किश्वर ने जिस ‘इकोसिस्टम’ पर हमला किया है, वह दरअसल उस गठजोड़ की ओर संकेत है जहां चुनिंदा मीडिया घराने और पार्टी के रणनीतिकार मिलकर एक ऐसा नैरेटिव सेट करते हैं जिसमें आम जनता की परेशानियां और जमीनी हकीकत कहीं खो जाती है।
सबसे बड़ा सवाल उस मीडिया की ‘विश्वसनीयता’ पर है जो हर छोटी बात पर घंटों डिबेट आयोजित करता है, लेकिन जब खुद उसकी भूमिका और नैतिकता पर सवाल उठते हैं, तो वह पूरी तरह मौन हो जाता है। क्या यह चुप्पी हितों के टकराव का परिणाम है? या फिर मीडिया का एक बड़ा वर्ग अब सत्ता के उस तंत्र का हिस्सा बन चुका है जहां सवाल पूछने की अनुमति केवल ‘दूसरों’ से है, अपनों से नहीं? मधु किश्वर के आरोपों पर भाजपा की रणनीतिक खामोशी को यह कहकर टाला जा सकता है कि वह इसे तूल नहीं देना चाहती, लेकिन मीडिया की चुप्पी को ‘व्यावसायिक विवशता’ के अलावा और क्या नाम दिया जाए?
सत्ता और मीडिया के बीच का यह सन्नाटा लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत नहीं है। यदि एक पुरानी समर्थक को अपनी ही विचारधारा के तंत्र में घुटन महसूस हो रही है और उसे सार्वजनिक मंचों पर आकर अपनी व्यथा कहनी पड़ रही है, तो यह आत्ममंथन का समय है। सवाल केवल मधु किश्वर का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो आलोचना को स्वीकार करने का साहस खो चुकी है। इतिहास गवाह है कि जब संवाद के दरवाजे बंद होते हैं और सवालों को खामोशी से दबाने की कोशिश की जाती है, तो वह सन्नाटा अक्सर किसी बड़े राजनीतिक या सामाजिक विस्फोट की आहट होता है। ‘In Breaking’ का मानना है कि लोकतंत्र केवल समर्थन से नहीं, बल्कि सार्थक असहमति और कठिन सवालों से ही जीवित रहता है।
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