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संपादकीय: मधु किश्वर के सवाल और सत्ता-मीडिया की रहस्यमयी चुप्पी

लोकतंत्र में असहमति की आवाज चाहे बाहर से आए या भीतर से, वह व्यवस्था को आईना दिखाने का काम करती है। लेकिन जब यह आवाज किसी ऐसे व्यक्तित्व की हो जो दशकों तक एक विचारधारा और एक राजनीतिक दल के सबसे मुखर समर्थकों में गिना जाता रहा हो, तो उसकी गूंज और भी गहरी हो […]