ब्यूरो (साक्षी कुमारी,मुजफ्फरपुर, बिहार)। भारत को कृषि प्रधान देश के रूप में ही देखा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां सबसे अधिक कठिनाई किसानों को ही होती है। कभी सूखा तो कभी बाढ़ और कभी बीज तो कभी मार्केट की समस्या उनके साथ लगी ही रहती है। बात जब महिला किसानों की आती है तो यह समस्या और भी अधिक बढ़ जाती है।
देश के कई ऐसे ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां महिला किसानों को सबसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक उदाहरण सितुआरा गांव भी है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला स्थित मुसहरी ब्लॉक का
ब्यूरो (साक्षी कुमारी,मुजफ्फरपुर, बिहार)। भारत को कृषि प्रधान देश के रूप में ही देखा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां सबसे अधिक कठिनाई किसानों को ही होती है। कभी सूखा तो कभी बाढ़ और कभी बीज तो कभी मार्केट की समस्या उनके साथ लगी ही रहती है। बात जब महिला किसानों की आती है तो यह समस्या और भी अधिक बढ़ जाती है।
देश के कई ऐसे ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां महिला किसानों को सबसे अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक उदाहरण सितुआरा गांव भी है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला स्थित मुसहरी ब्लॉक का यह गांव बाहर से देखने पर एक साधारण गांव जैसा ही लगता है, लेकिन इसके भीतर सैकड़ों परिवारों की ज़िंदगी खेतों की मिट्टी से जुड़ी हुई है।
करीब 400 घरों वाले इस गांव में अनुसूचित जाति, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी ज्यादा है। यहां की ज्यादातर महिलाओं के लिए खेती सिर्फ काम नहीं बल्कि घर चलाने का एकमात्र सहारा भी है। खेत, बीज, मौसम और मेहनत इनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी समस्या है जो हर साल उनकी मेहनत को कमजोर कर देती है और वह है इन्हें समय पर बीज का न मिल पाना।
यहां की 60 वर्षीय महिला किसान उमा देवी कहती हैं, “जब समय पर बीज नहीं मिलता है तो फसल समय पर नहीं उग पाती और बाद में उत्पादन भी कम हो जाता है।” उमा देवी की यह बात सिर्फ एक किसान की परेशानी नहीं है बल्कि गांव की लगभग हर महिला किसान की कहानी है। खेत तैयार होने के बाद अगर बीज समय पर न मिले तो पूरा खेती का चक्र बिगड़ जाता है।
दरअसल बिहार में कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। राज्य की लगभग 76 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में खेती पर निर्भर है। राज्य में करीब 56 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है और धान, गेहूं और मक्का प्रमुख फसलें हैं। बिहार में धान का उत्पादन लगभग 99.34 लाख टन, गेहूं 78.27 लाख टन और मक्का 66.03 लाख टन के आसपास है। मुजफ्फरपुर जिले की पहचान भी कृषि से ही है। इन फसलों के अलावा यहां फल और सब्जियों की खेती भी काफी अधिक मात्रा में होती है। लीची, आम, केला, आलू, प्याज, फूलगोभी और बैंगन जैसी फसलें यहां बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं।
लेकिन खेती का यह मजबूत ढांचा जमीन पर रहने वाले छोटे किसानों विशेषकर महिला किसानों की परेशानियों को हमेशा हल नहीं कर पाता। गांव की 35 वर्षीय महिला किसान रिंकू देवी बताती हैं, “हमें समय पर बीज नहीं मिलता है। इसलिए बाजार से खरीदना पड़ता है। जो बहुत महंगा मिलता है। अगर सरकार समय पर बीज उपलब्ध करा दे तो हमारी बहुत मदद हो सकती है।”
रिंकू देवी की बात इस गांव की आर्थिक सच्चाई को सामने लाती है। सितुआरा समेत मुजफ्फरपुर के कई ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश छोटे या सीमांत किसान हैं, जिनके पास बहुत कम जमीन होती है। ऐसे में अगर उन्हें बीज, खाद या अन्य कृषि सामग्री महंगे दामों पर खरीदनी पड़े तो खेती की लागत बढ़ जाती है और मुनाफा कम हो जाता है।
मुजफ्फरपुर और उत्तर बिहार के इलाके हर साल बाढ़ से भी प्रभावित होते हैं। मौसम की अनिश्चितता भी खेती के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है, जिससे खरीफ फसलों पर असर पड़ता है।
सितुआरा गांव की 70 वर्षीय महिला किसान सविता देवी कहती हैं, “हम लोग दिन-रात अच्छी फसल के लिए मेहनत करते हैं क्योंकि हमारी आजीविका का यही एक साधन है। लेकिन जब समय पर बीज नहीं मिलता तो हमें बाजार से महंगे दाम पर बीज खरीदना पड़ता है। अगर बाद में ज्यादा बारिश हो जाए या सूखा पड़ जाए तो हमें दोहरा नुकसान होता है और हमारी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है।”
मुजफ्फरपुर में खेती मुख्य रूप से तीन प्रमुख सीजन में होती है। पहला खरीफ सीजन होता है जिसमें मई-जून के दौरान धान, मक्का और बाजरा जैसी फसलें बोई जाती हैं और अक्टूबर-नवंबर तक कटाई होती है। दूसरा रबी सीजन होता है जिसमें अक्टूबर-नवंबर में गेहूं, चना, सरसों और जौ की बुवाई की जाती है और मार्च-अप्रैल में फसल तैयार होती है। तीसरा ज़ैद सीजन होता है जिसमें मार्च से जून के बीच सब्जियां और कुछ विशेष किस्म की फसलें उगाई जाती हैं। यहां की अर्थव्यवस्था में बागवानी का भी बड़ा योगदान है। यहां की शाही लीची देश-विदेश में प्रसिद्ध है और मुजफ्फरपुर अकेले देश की लगभग 71 प्रतिशत लीची का उत्पादन करता है। इसके बावजूद गांवों में रहने वाले छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है।
बिहार की प्रति व्यक्ति आय देश के औसत से काफी कम रही है, जिससे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले किसानों की आय सीमित बनी रहती है। जब खेती पर निर्भर परिवारों की आय कम होती है और खेती से जुड़े संसाधन समय पर नहीं मिलते, तब सबसे अधिक बोझ महिलाओं पर पड़ता है। वे खेत में काम करती हैं, घर संभालती हैं और परिवार की जिम्मेदारी भी उठाती हैं। लेकिन खेती से जुड़ी योजनाओं और संसाधनों तक उनकी पहुंच अभी भी सीमित है। ऐसे में अगर इन महिला किसानों की स्थिति को बेहतर बनाना है तो कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
सबसे पहले गांव स्तर पर बीज वितरण की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे किसानों को समय पर और उचित कीमत पर बीज मिल सके। पंचायत स्तर पर बीज बैंक बनाए जा सकते हैं जहां किसान जरूरत के समय बीज प्राप्त कर सकें।
दूसरा, महिला किसानों के लिए स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि वे सामूहिक रूप से बीज और अन्य कृषि संसाधन खरीद सकें। इससे लागत कम होगी और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
तीसरा, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए ऐसी फसल किस्मों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जो कम समय में तैयार हो जाएं और मौसम की अनिश्चितता को सहन कर सकें। इसके साथ ही कृषि विभाग को गांवों में नियमित प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाने चाहिए ताकि महिला किसान आधुनिक खेती के तरीकों से जुड़ सकें।
सितुआरा गांव की महिलाएं हर साल अपने खेतों में उम्मीद बोती हैं। लेकिन यह उम्मीद तभी हकीकत बन सकती है जब उन्हें सही समय पर सही संसाधन मिलें। समय पर बीज मिलना सिर्फ खेती की जरूरत नहीं है, बल्कि उन परिवारों के जीवन को स्थिर करने का रास्ता भी है जिनकी दुनिया खेत की मेड़ों से शुरू होकर वहीं खत्म होती है। अगर नीति और व्यवस्था इन महिलाओं की मेहनत के साथ खड़ी हो जाए, तो मुजफ्फरपुर की मिट्टी सिर्फ फसल ही नहीं बल्कि हजारों परिवारों की बेहतर जिंदगी भी उगा सकती है।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)
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