लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव दिया है। अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होने तक लोकसभा स्पीकर सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। आइये समझते हैं क्या है अविश्वास प्रस्ताव और इस पर कैसे होगा फैसला?
प्रस्ताव का नोटिस: कांग्रेस और ‘INDIA’ गठबंधन के अन्य दलों ने आज दोपहर 1:14 बजे लोकसभा महासचिव को ओम बिरला को पद से हटाने का औपचारिक नोटिस सौंपा।
सांसदों के हस्ताक्षर: इस नोटिस पर 118 से 120 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। इसमें कांग्रेस, सपा, डीएमके, और आरजेडी जैसे दल
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव दिया है। अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होने तक लोकसभा स्पीकर सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। आइये समझते हैं क्या है अविश्वास प्रस्ताव और इस पर कैसे होगा फैसला?
प्रस्ताव का नोटिस: कांग्रेस और ‘INDIA’ गठबंधन के अन्य दलों ने आज दोपहर 1:14 बजे लोकसभा महासचिव को ओम बिरला को पद से हटाने का औपचारिक नोटिस सौंपा।
सांसदों के हस्ताक्षर: इस नोटिस पर 118 से 120 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। इसमें कांग्रेस, सपा, डीएमके, और आरजेडी जैसे दल शामिल हैं।
ओम बिरला का बड़ा फैसला: नोटिस मिलने के बाद स्पीकर ओम बिरला ने एक गरिमापूर्ण कदम उठाते हुए घोषणा की है कि जब तक इस प्रस्ताव पर फैसला नहीं हो जाता, वे सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने महासचिव को निर्देश दिया है कि नियमों के तहत नोटिस की जांच कर आगे की कार्रवाई की जाए।
राहुल गांधी ने साइन क्यों नहीं किए? दिलचस्प बात यह है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि संसदीय परंपरा के अनुसार, विपक्ष के नेता (LoP) का अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना उचित नहीं माना जाता।
विपक्ष के मुख्य आरोप क्या हैं?
विपक्ष ने स्पीकर पर “पक्षपातपूर्ण रवैया” अपनाने का आरोप लगाया है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
बोलने से रोकना: आरोप है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को पर्याप्त समय नहीं दिया गया और उनके भाषणों में बार-बार बाधा डाली गई।
किताब का संदर्भ: विवाद तब बढ़ा जब राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित किताब का हवाला देना चाहा, लेकिन स्पीकर ने इसकी अनुमति नहीं दी।
सांसदों का निलंबन: हाल ही में विपक्ष के 8 सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया, जिसे विपक्ष ने ‘तानाशाही’ करार दिया है।
सुरक्षा और गरिमा: विपक्ष ने स्पीकर के उस बयान पर भी आपत्ति जताई है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़ने वाली थीं।
संवैधानिक प्रक्रिया (अनुच्छेद 94c)
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) और लोकसभा नियमों के तहत चलती है:
14 दिन का नोटिस: स्पीकर को हटाने के लिए कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य है।
50 सांसदों का समर्थन: सदन में चर्चा के लिए प्रस्ताव पेश करने हेतु कम से कम 50 सांसदों का सदन में खड़े होकर समर्थन जताना ज़रूरी है।
मतदान: अध्यक्ष को केवल तभी हटाया जा सकता है जब लोकसभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत (Effective Majority) द्वारा प्रस्ताव पारित हो जाए।
ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान स्थिति
भारतीय संसदीय इतिहास में अब तक किसी भी लोकसभा अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटाया नहीं जा सका है। वर्तमान आंकड़ों के लिहाज से:
बीजेपी/NDA की स्थिति: सत्ता पक्ष के पास स्पष्ट बहुमत है, इसलिए इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना न के बराबर है।
विपक्ष की रणनीति: विपक्षी दलों का मुख्य उद्देश्य सरकार और अध्यक्ष पर दबाव बनाना और जनता के बीच “लोकतंत्र के दमन” का नैरेटिव सेट करना है।
TMC का रुख: फिलहाल तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जो विपक्षी एकजुटता के भीतर कुछ मतभेदों की ओर इशारा करता है।
अगला कदम: अब लोकसभा सचिवालय इस नोटिस की कानूनी और संवैधानिक बारीकियों की जांच करेगा। अगले 14 दिनों के भीतर सदन में इस पर चर्चा की तारीख तय की जा सकती है।
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