“फ्रीबीज”(मुफ्त सेवाओं) के मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट ने चिंता जताई

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सुप्रीम कोर्ट ने आज (19 फरवरी 2026) ‘फ्रीबीज’ या मुफ्त की रेवड़ियों के मुद्दे पर अपनी अब तक की सबसे सख्त टिप्पणियां की हैं। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि मुफ्त सुविधाओं का बढ़ता कल्चर देश के आर्थिक विकास के लिए घातक है।

कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां और फटकार
राजस्व घाटा बनाम मुफ्त उपहार: कोर्ट ने हैरानी जताई कि देश के अधिकांश राज्य भारी ‘राजस्व घाटे’ (Revenue Deficit) में चल रहे हैं, फिर भी चुनाव से ठीक पहले मुफ्त बिजली, राशन और नकद हस्तांतरण जैसी योजनाएं क्यों शुरू की जाती हैं।

“हम कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं?”: CJI ने पूछा कि अगर सुबह से ही लोगों को मुफ्त भोजन, गैस और बिजली दी जाएगी, तो क्या लोग काम करना चाहेंगे? कोर्ट ने चिंता जताई कि यह व्यवस्था लोगों को ‘परजीवी’ (dependent) बना रही है और उन्हें मुख्यधारा से काट रही है।

अमीर-गरीब में अंतर जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना राज्य का कर्तव्य है, लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम ‘बड़े जमींदारों’ और संपन्न लोगों को मुफ्त बिजली या अन्य लाभ देना सरासर तुष्टीकरण (Appeasement) है।

टैक्सपेयर्स का पैसा: कोर्ट ने सवाल उठाया कि राज्यों को यह बताना चाहिए कि इन योजनाओं के लिए पैसा कहाँ से आएगा? क्या यह टैक्सपेयर्स के पैसे का दुरुपयोग नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट की नसीहत
विकास बनाम रेवड़ी: बेंच ने कहा कि राज्यों को अपनी कुल आय का कम से कम 25% हिस्सा विकास कार्यों (सड़क, अस्पताल, स्कूल) में खर्च करना चाहिए, न कि सिर्फ सैलरी देने और मुफ्त उपहार बांटने में।

रोजगार पर जोर: कोर्ट ने सलाह दी कि मुफ्त उपहारों के बजाय सरकारों को ऐसी ‘प्लान्ड पॉलिसियां’ लानी चाहिए जिससे रोजगार के अवसर पैदा हों, ताकि लोग सम्मान के साथ अपनी आजीविका कमा सकें।

चुनाव पूर्व घोषणाओं पर रोक की मांग: याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि चुनाव से पहले ‘अतार्किक फ्रीबीज’ का वादा करने वाले दलों का चुनाव चिन्ह जब्त किया जाए या उन्हें अमान्य घोषित किया जाए।

यह मामला चर्चा में क्यों आया?
यह टिप्पणी तमिलनाडु की एक बिजली कंपनी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आई, जहां घाटे में होने के बावजूद सभी के लिए मुफ्त बिजली की बात की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या बन चुकी है।


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