देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीमकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी वराले की पीठ ने कहा कि वांगचुक की स्वास्थ्य रिपोर्ट ठीक नहीं है और केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम नटराज को इस मामले में निर्देश लेने चाहिए। मामले में गुरुवार को भी अदालत में दलीलें पेश की जाएंगी।
कोर्ट की चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सोनम वांगचुक लगभग 5 महीने से हिरासत में हैं और उनकी सेहत
देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीमकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी वराले की पीठ ने कहा कि वांगचुक की स्वास्थ्य रिपोर्ट ठीक नहीं है और केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम नटराज को इस मामले में निर्देश लेने चाहिए। मामले में गुरुवार को भी अदालत में दलीलें पेश की जाएंगी।
कोर्ट की चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सोनम वांगचुक लगभग 5 महीने से हिरासत में हैं और उनकी सेहत ठीक नहीं है। कोर्ट ने उनकी उम्र और गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए सरकार से पूछा है कि क्या वह उनकी हिरासत पर दोबारा विचार कर सकती है?
सरकार का पक्ष: केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत इसलिए पकड़ा गया है ताकि समाज में शांति बनी रहे। सरकार का आरोप है कि पिछले साल लेह में हुई हिंसा (जिसमें 4 लोगों की मौत हुई थी) के पीछे वांगचुक के भड़काऊ भाषणों का हाथ था।
कोर्ट की टिप्पणी: जजों ने साफ किया कि सिर्फ “खतरा महसूस होने” के आधार पर किसी को बंद रखना काफी नहीं है, बल्कि इसके ठोस कानूनी आधार होने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकार का निर्णय कानून के दायरे में होना चाहिए।
क्या है मामला:
सोनम वांगचुक की पत्नी ने उनकी हिरासत के खिलाफ कोर्ट में अर्जी दी थी।
सरकार ने क्या कहा?: “यह सजा नहीं है, बल्कि सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम है। मजिस्ट्रेट ने सबूत देखकर ही आदेश दिया होगा।”
कोर्ट ने क्या कहा?: “वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट चिंताजनक है। सरकार को उनकी सेहत और उम्र का ख्याल रखते हुए अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।”
सोनम वांगचुक के मामले में जिन दो कानूनी शब्दों का जिक्र हुआ है, वे भारतीय कानून और संविधान के बहुत महत्वपूर्ण हिस्से हैं। आइए इन्हें आसान भाषा में समझते हैं:
1. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA)
इसे हिंदी में ‘रासुका’ (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) भी कहा जाता है। यह 1980 में बना एक बेहद सख्त कानून है।
निवारक हिरासत (Preventive Detention): इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति को अपराध करने के बाद नहीं, बल्कि अपराध करने से रोकने के लिए पहले ही गिरफ्तार कर लेना। अगर सरकार को लगता है कि कोई व्यक्ति देश की सुरक्षा या कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है, तो उसे हिरासत में लिया जा सकता है।
बिना वारंट गिरफ्तारी: इसके तहत पुलिस या प्रशासन किसी व्यक्ति को बिना किसी औपचारिक आरोप (Charge) के गिरफ्तार कर सकता है।
कितने समय तक?: किसी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है, हालांकि समय-समय पर इसकी समीक्षा (Review) करनी पड़ती है।
वकील का अधिकार नहीं: सामान्य कानूनों के विपरीत, NSA के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के समय वकील की मदद लेने का कानूनी अधिकार नहीं होता (प्रारंभिक चरण में)।
2. अनुच्छेद 32 (Article 32):
डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसे “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था। यह नागरिकों को उनके अधिकारों की रक्षा करने की शक्ति देता है।
मौलिक अधिकारों का रक्षक: अगर सरकार या कोई संस्था आपके ‘मौलिक अधिकारों’ (जैसे जीने की आजादी, समानता का अधिकार) को छीनती है, तो आप सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।
रिट (Writs) जारी करना: अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट 5 तरह के विशेष आदेश (Writs) जारी कर सकता है। सोनम वांगचुक के मामले में ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) सबसे महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है— “शरीर को कोर्ट के सामने पेश करो” और गिरफ्तारी का कारण बताओ।
गारंटी: यह अनुच्छेद खुद भी एक मौलिक अधिकार है। यानी, आपको न्याय के लिए कोर्ट जाने से कोई नहीं रोक सकता।
इस केस में इनका क्या संबंध है?
सोनम वांगचुक को NSA के तहत बंद किया गया है, और उनकी पत्नी ने अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल करते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है कि यह हिरासत गलत है और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
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