शब-ए-बारात, इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की 14वीं तारीख की रात को मनाई जाती है। ‘शब’ का अर्थ है रात और ‘बारात’ का अर्थ है बरी होना या मुक्ति मिलना।
इस साल (2026) यह रात 3 फरवरी की शाम से 4 फरवरी की सुबह (आज) तक मनाई जा रही है। मुस्लिम समुदाय के लिए यह रात आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पूरी रात इबादत करने के मुख्य कारण
मुस्लिम धर्मावलंबी इस रात को मुक्ति की रात”मानते हैं। रात भर जागकर इबादत करने के पीछे ये प्रमुख मान्यताएं हैं:
गुनाहों की माफी (तौबा):
माना
शब-ए-बारात, इस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की 14वीं तारीख की रात को मनाई जाती है। ‘शब’ का अर्थ है रात और ‘बारात’ का अर्थ है बरी होना या मुक्ति मिलना।
इस साल (2026) यह रात 3 फरवरी की शाम से 4 फरवरी की सुबह (आज) तक मनाई जा रही है। मुस्लिम समुदाय के लिए यह रात आध्यात्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पूरी रात इबादत करने के मुख्य कारण
मुस्लिम धर्मावलंबी इस रात को मुक्ति की रात”मानते हैं। रात भर जागकर इबादत करने के पीछे ये प्रमुख मान्यताएं हैं:
गुनाहों की माफी (तौबा):
माना जाता है कि इस रात अल्लाह अपने बंदों के लिए रहमत के दरवाजे खोल देता है। लोग अपने पिछले साल के गुनाहों के लिए अल्लाह से माफी मांगते हैं ताकि वे सजा से ‘बरी’ (मुक्त) हो सकें।
तकदीर का फैसला:
एक बड़ी मान्यता यह है कि इस रात आने वाले पूरे साल का ‘बजट’ यानी किस्मत का फैसला होता है। इसमें लिखा जाता है कि अगले एक साल में कौन पैदा होगा, किसकी मृत्यु होगी और किसे कितना ‘रिज़्क’ (रोजी-रोटी) मिलेगा। इसलिए लोग बेहतर भविष्य के लिए दुआ करते हैं।
पूर्वजों की याद (ज़ियारत):
इस रात लोग कब्रिस्तान जाते हैं और अपने उन परिजनों के लिए दुआ करते हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। वे उनकी कब्रों पर फातिहा पढ़ते हैं और उनके गुनाहों की माफी की प्रार्थना करते हैं।
शाबान का महत्व:
पैगंबर मोहम्मद साहब शाबान के महीने में कसरत से इबादत और रोजे रखा करते थे, इसलिए उनके अनुयायी भी इस रात को सुन्नत (परंपरा) मानते हुए इबादत करते हैं।
इस दिन क्या-क्या किया जाता है?
1. नमाज़ और कुरान: लोग रात भर मस्जिदों या घरों में नफ़्ल नमाज़ें पढ़ते हैं और कुरान की तिलावत (पाठ) करते हैं।
2. रोज़ा: 14 शाबान के गुजरने के बाद यानी 15 तारीख को (आज, 3 फरवरी) बहुत से लोग रोज़ा रखते हैं।
3. पकवान और दान: घरों में हलवा या अन्य मीठे पकवान बनाए जाते हैं और उन्हें गरीबों व पड़ोसियों में बांटा जाता है।
4. चरागां (रोशनी): मस्जिदों और घरों को रोशनी से सजाया जाता है, जिसे ‘चरागां’ कहा जाता है।
एक जरूरी नोट: हालांकि कई लोग इस रात पटाखे फोड़ते हैं, लेकिन मुस्लिम धर्मगुरु और विद्वान इसे गलत मानते हैं। वे जोर देते हैं कि यह रात शोर-शराबे की नहीं, बल्कि खामोशी से इबादत और introspection (आत्मचिंतन) की है।
शब-ए-बारात के बारे में कुछ और गहरी और दिलचस्प जानकारियां यहाँ दी गई हैं, जो इसे एक विशेष आध्यात्मिक रात बनाती हैं:
1. शिया और सुन्नी मान्यताओं में अंतर
इस रात को मनाने के पीछे शिया और सुन्नी समुदायों की अपनी-अपनी महत्वपूर्ण मान्यताएं हैं:
सुन्नी मान्यता: सुन्नी मुसलमान इसे “गुनाहों से माफी” और “तकदीर के फैसले” की रात मानते हैं। वे इस रात को पैगंबर मोहम्मद साहब की सुन्नत (परंपरा) से जोड़ते हैं, क्योंकि उन्होंने इस रात कब्रिस्तान जाकर पूर्वजों के लिए दुआ की थी।
शिया मान्यता: शिया समुदाय के लिए यह रात इसलिए भी खास है क्योंकि इसी दिन (15 शाबान) उनके 12वें इमाम, इमाम अल-महदी का जन्म हुआ था। वे इस दिन को उनके जन्मोत्सव के रूप में बहुत उत्साह से मनाते हैं।
2. “किस्मत का बजट” और फरिश्ते
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात को अल्लाह फरिश्तों को अगले एक साल के लिए निर्देश देते हैं।
किताबों में उन लोगों के नाम लिखे जाते हैं जो अगले साल पैदा होने वाले हैं या जिनकी मृत्यु होनी है।
इसी रात को लोगों के लिए ‘रिज़्क’ (रोजी-रोटी/भोजन) का निर्धारण भी किया जाता है। यही कारण है कि लोग पूरी रात जागकर अपने और अपने परिवार के अच्छे नसीब के लिए दुआ करते हैं।
3. हलवा खाने की परंपरा के पीछे की कहानी
शब-ए-बारात पर हलवा बनाना बहुत लोकप्रिय है। इसके पीछे एक भावुक कहानी प्रचलित है: कहा जाता है कि उहुद की जंग में पैगंबर मोहम्मद साहब का एक दांत मुबारक शहीद (टूट) हो गया था। उस समय उन्हें कुछ नरम खाने की जरूरत थी, इसलिए उनके लिए हलवा बनाया गया था। उनकी इसी तकलीफ और याद में दुनिया भर के मुसलमान इस दिन हलवा बनाकर बांटते हैं।
4. माफी माँगने का सामाजिक महत्व
इस रात का एक बड़ा मकसद आपसी भाईचारा भी है। लोग न केवल अल्लाह से माफी मांगते हैं, बल्कि एक-दूसरे को मैसेज भेजकर या मिलकर पुराने झगड़ों और गलतियों के लिए माफी मांगते हैं। माना जाता है कि अगर आपके किसी भाई या पड़ोसी का दिल दुखा है, तो अल्लाह भी उस बंदे की इबादत कबूल नहीं करता।
5. पूरी दुनिया में अलग-अलग नाम
यह रात केवल भारत या पाकिस्तान में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है:
ईरान/अफगानिस्तान: इसे ‘चिराग-ए-बारात’ कहते हैं।
मलेशिया/इंडोनेशिया: इसे ‘निसफू साबान’ (Nisfu Syaaban) कहा जाता है।
तुर्की:यहाँ इसे ‘बेरात कांदिली’ (Berat Kandili) के नाम से जाना जाता है।
6. रमजान की तैयारी
शब-ए-बारात को रमजान का द्वार भी कहा जाता है। यह रात शाबान के महीने के ठीक बीच में आती है, जो रमजान से ठीक पहले का महीना है। लोग इस रात इबादत करके अपने मन और शरीर को रमजान के कठिन उपवासों (रोजों) के लिए तैयार करना शुरू कर देते हैं।
एक रोचक तथ्य: इस रात के बारे में यह भी कहा जाता है कि अल्लाह ‘बनु कलब’ कबीले की बकरियों के शरीर पर मौजूद बालों से भी ज्यादा लोगों के गुनाह माफ कर देता है (यह कबीला अपनी बहुत सारी बकरियों के लिए मशहूर था)।
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