उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की एक विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने शुक्रवार को एक दशक से चले आ रहे बाल यौन शोषण के रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने सिंचाई विभाग के पूर्व जूनियर इंजीनियर (JE) रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है।
अपराध की भयावहता: 33 मासूमों के साथ क्रूरता
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने इस मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) की श्रेणी में रखा। साल 2010 से 2020 के बीच आरोपियों ने 33 नाबालिग लड़कों का
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की एक विशेष पॉक्सो (POCSO) अदालत ने शुक्रवार को एक दशक से चले आ रहे बाल यौन शोषण के रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने सिंचाई विभाग के पूर्व जूनियर इंजीनियर (JE) रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है।
अपराध की भयावहता: 33 मासूमों के साथ क्रूरता
अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने इस मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) की श्रेणी में रखा। साल 2010 से 2020 के बीच आरोपियों ने 33 नाबालिग लड़कों का यौन शोषण किया। पीड़ितों में कुछ बच्चों की उम्र महज 3 साल थी।
वैश्विक नेटवर्क: आरोपियों ने न केवल शोषण किया, बल्कि बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) तैयार कर इंटरनेट के माध्यम से इसे दुनिया भर के 47 देशों में फैलाया।
रिकॉर्ड बरामदगी: जांच में सामने आया कि आरोपियों ने बच्चों की 2 लाख से अधिक आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित किए थे।
पीड़ितों के लिए मुआवजा और न्याय: अदालत ने केवल सजा ही नहीं सुनाई, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कड़े निर्देश भी दिए हैं:
सरकारी मुआवजा: यूपी सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह प्रत्येक 33 पीड़ितों को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे।
जब्त संपत्ति का वितरण: सीबीआई (CBI) के अनुसार, अदालत ने यह भी आदेश दिया कि दोषी रामभवन के घर से जब्त की गई कुल नकदी को सभी पीड़ितों के बीच समान रूप से बांटा जाए।
किन धाराओं में हुए दोषी?
विशेष लोक अभियोजक सौरभ सिंह के अनुसार, दंपति को निम्नलिखित गंभीर अपराधों के लिए दोषी पाया गया:
गंभीर लैंगिक हमला (Aggravated Penetrative Sexual Assault)
अश्लील उद्देश्यों के लिए बच्चों का इस्तेमाल।
बाल अश्लील सामग्री का भंडारण और वितरण।
आपराधिक साजिश और उकसावा।
अदालत की टिप्पणी: न्यायाधीश ने इस अपराध को “अभूतपूर्व क्रूरता” बताते हुए कहा कि ऐसे अपराध समाज की अंतरात्मा को घायल करते हैं, इसलिए दोषियों को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।
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