यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे समाज लंबे समय से देखने से बचता रहा है। यह कहानी है उन महिलाओं की, जिन्हें शादी के नाम पर झारखंड, बिहार, बंगाल और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से हरियाणा, पंजाब और राजस्थान लाया जाता है। बाहर से देखने पर यह विवाह लगता है, लेकिन भीतर से यह एक संगठित शोषण है—एक ऐसा व्यापार, जिसे “खर्चा-पानी” जैसे शब्दों से सामाजिक वैधता दे दी गई है।
हरियाणा और पंजाब के कई इलाकों में आज भी बिचौलियों का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय है। ये लोग गरीब परिवारों की
यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे समाज लंबे समय से देखने से बचता रहा है। यह कहानी है उन महिलाओं की, जिन्हें शादी के नाम पर झारखंड, बिहार, बंगाल और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से हरियाणा, पंजाब और राजस्थान लाया जाता है। बाहर से देखने पर यह विवाह लगता है, लेकिन भीतर से यह एक संगठित शोषण है—एक ऐसा व्यापार, जिसे “खर्चा-पानी” जैसे शब्दों से सामाजिक वैधता दे दी गई है।
हरियाणा और पंजाब के कई इलाकों में आज भी बिचौलियों का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय है। ये लोग गरीब परिवारों की बेटियों को बेहतर भविष्य का सपना दिखाकर सौदे तय करते हैं। लड़की की सहमति, उसकी उम्र, उसकी इच्छा—कुछ भी मायने नहीं रखता। न कोई कानूनी प्रक्रिया होती है, न विवाह की सामाजिक गरिमा। न फेरे, न रस्में—बस पैसों का लेन-देन और लड़की की ‘डिलीवरी’।
शादी के शुरुआती कुछ महीने अक्सर सामान्य रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हकीकत सामने आने लगती है। कुछ ही समय में महिला को यह एहसास करा दिया जाता है कि वह इस घर की बराबरी की बहू नहीं है। उसे “बिहारी”, “बिहारन”, “मोलकी” जैसे अपमानजनक शब्दों से पुकारा जाता है। ये शब्द केवल ताने नहीं होते, बल्कि उसकी पहचान और आत्मसम्मान को कुचलने का तरीका होते हैं।
उसे पारिवारिक समारोहों से दूर रखा जाता है। रिश्तेदारी में उसकी कोई जगह नहीं होती। पड़ोस में भी वह एक अजनबी की तरह रहती है। उसकी भाषा, पहनावा, खान-पान—सब पर तंज कसे जाते हैं। यह जताया जाता है कि वह ‘कमतर’ है, क्योंकि वह इस समाज से नहीं आई।
इन महिलाओं से दिन-रात काम कराया जाता है—घर का सारा बोझ, खेतों की मेहनत, पशुओं की देखभाल—सब कुछ। लेकिन इसके बदले न सम्मान मिलता है, न सुरक्षा। अक्सर उन्हें साफ़ शब्दों में कह दिया जाता है,
“तुम्हें खरीद कर लाए हैं।”
अगर वह सवाल करे, अपने अधिकार की बात करे या विरोध जताए, तो हिंसा उसका इंतज़ार करती है—शारीरिक भी और मानसिक भी। डर के साए में जीना उसकी नियति बन जाती है।
सबसे त्रासद स्थिति यह है कि ये महिलाएँ अपनी पीड़ा किसी से कह भी नहीं पातीं। ससुराल में बोलें तो अपमान मिलता है। मायके फोन करें तो यही सोचती हैं कि पहले से परेशान माँ-बाप पर और बोझ क्यों डालें। धीरे-धीरे चुप्पी उनकी आदत बन जाती है, और यही चुप्पी इस अपराध को ज़िंदा रखती है।
कई महिलाएँ सालों तक अपने घर लौटने की कोशिश करती रहती हैं। रोती हैं, गिड़गिड़ाती हैं, रास्ता ढूँढती हैं—लेकिन उन्हें जाने नहीं दिया जाता। उनका जीवन एक ऐसी अदृश्य जेल में बदल जाता है, जहाँ न दीवारें दिखती हैं, न ताले—लेकिन आज़ादी असंभव होती है।
यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। सवाल सिर्फ़ एक महिला का नहीं है, सवाल पूरे समाज की संवेदनशीलता का है।
अब समय आ गया है कि हम यह सवाल खुलकर पूछें—
क्या दुल्हन खरीदना अपराध नहीं है?
क्या इन महिलाओं को इंसान नहीं माना जाएगा?
और कब तक यह शोषण “शादी” के नाम पर चलता रहेगा?
ज़रूरत है कि इस सच्चाई को पहचाना जाए, दुल्हन तस्करी को उसका सही नाम दिया जाए और इसके खिलाफ़ सख़्त क़ानूनी कार्रवाई हो। समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी।
क्योंकि जब तक एक भी महिला खरीदी जाती रहेगी, तब तक हमारा समाज खुद को सभ्य कहने का अधिकार खो देता है।
(शिल्पा देवी, सखी मंडल हरयाणा की प्रवक्ता हैं)
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